Wednesday, 13 February 2019

शरीर में दर्द क्यों होते है??


सिद्ध आयुर्वेदिक

           शरीर में दर्द क्यों होते है??
    *वातदर्द रोगों की संपूर्ण जानकारी*
मात्र जानने से दर्दो से आप दर्दो से पाएंगे मुक्ति।



      *सिद्ध वातदर्द नाशक कल्पचुर्ण*
*सभी वातदर्द रोगों को जड़ से खत्म करता है*
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वात क्या है ??

          वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं।

शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है।

हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।

वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-
1.उदान वायु    - यह कण्ठ में होती है।
2.अपान वायु   - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।
3.प्राण वायु     -  यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।
4.व्यान वायु        - यह पूरे शरीर में होती है।5.समान वायु       - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।
वात रोग बहुत प्रकार की होती है।
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जैसे
1.आमवात :-
आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है।
इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।

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2.सन्धिवात रोग
         जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।

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3.यूरिक एसिड वात रोग
गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।

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मांसपेशियों में वातदर्द :-
         इस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।

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4.गठिया
        इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।

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अब जाने
           *वात रोग के लक्षण*
वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।

रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।
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अब जाने
वात रोग होने का कारण :-

वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है।
भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।
पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।

जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।

ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

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अब जाने
वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए।
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*क्या करे इस के लिए*
वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए।
इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए।
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इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।

कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।

पर यूरिक एसिड रोग  में इनका सेवन न करे।
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कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।

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वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए।

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रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए।

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इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है।

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शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है।रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है।

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वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान कर इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।

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*अगर आप वातरोग के आधीन आ गए हैं तो 2 से  5 महीने तक सिद्ध वातदर्द कल्पचुर्ण जरूर इस्तेमाल करे।*
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*कैसे बनता है सिद्ध वातदर्द कल्पचुर्ण*
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सिद्ध इन्द्रयाण अजवाइन*

सिद्ध अयूर्वादिक

               *सिद्ध इन्द्रयाण अजवाइन*

समस्त दर्द, गठिया रोगों, कफ़ रोगों, स्तन रोगों,पेट के रोगों औऱ आंत के रोगो में सदियों से इन्द्रयाण अजवाइन को अमृत माना जाता रहा है।

           *कैसे तैयार होती हैं इन्द्रयाण अजवाइन*

        *इन्द्रयाण फ़ल में अजवाइन को डाल देते है।*
*5 किलो अजवाइन में 3 किलो इन्द्रयाण 500 ग्राम काला नमक,काली मिर्च  समेत  7 और अयूर्वादिक जड़ी बूटियों को मिलाकर कर 60 दिन के लिए रख देते हैं।*

5 किलो अजवाइन में 3 किलो इन्द्रयाण 500 ग्राम काला नमक,काली मिर्च
★भूमि आवला          50  ग्राम
★बाकुची                 20  ग्राम
★शुद्ध शिलाजी        10  ग्राम
★काली मिर्च            20  ग्राम
★सफ़ेद जीरा           50  ग्राम
★काला जीरा।          50  ग्राम
★कुडू                     50  ग्राम

*60 दिन में इन्द्रयाण अजवाइन तैयार  हो जाती हैं*

       *Online मंगवा सकते हैं इन्द्रयाण अजवाइन*

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     *इन्द्रायण (गड्तुम्बा) के बारे संपूर्ण जानकरी*

इन्द्रायण की बेल समस्त भारत में पाई जाती है। इसकी लंबाई 20 से 30 फुट होती है। पत्ते असमान भागों में विभक्त तरबूज के पत्तों के समान 2-3 इंच लंबे और 2 इंच चौड़े होते हैं। पुष्प घंटाकार, पीले रंग के, पांच हिस्सों में बंटे होते हैं। फल गोल, मांसल, चिकने, 2-3 इंच व्यास के, कच्ची हालत में हरे और पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। खरबूजे के समान इसके फल में 6 फांकें होती हैं। फलमज्जा कोमल स्पंज के समान, स्वाद में अत्यंत तिक्त होती है। बीज मज्जा में गढ़े रहते हैं। सामान्यतया छोटी और बड़ी, दो प्रकार की इन्द्रायण देखने को मिलती है, जिसमें 45-120 फल लगते हैं। उल्लेखनीय है कि बड़ी इन्द्रायण का फल पकने के बाद लाल रंग का हो जाता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम

संस्कृत – इन्द्रवारुणी
हिंदी – इन्द्रायण
मराठी – इन्द्रफल
गुजराती – इन्द्रावणा
बंगाली – राखाल शसा
अंग्रेजी – कोलोसिन्थ (Colocynth) बिटर एपल (Bitter Apple)
लेटिन सिट्रयुलस कोलोसिन्थस   (Citrullus Colocynthis) |
इन्द्रायण के औषधीय गुण

आयुर्वेदिक मतानुसार इन्द्रायण रस में तिक्त, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण प्रकृति, विपाक में कटु, कफ पित्तहर, सभी प्रकार के उदर रोग नाशक, पाचक, वात शामक, कब्ज़

दूर करने वाला, शोथहर, तीव्र गर्भाशय संकोचक, कामला, ज्वर, श्वास, खांसी, कृमि रोग, घाव, तिल्ली और ग्रंथि रोगों में लाभदायक है।

वैज्ञानिक मतानुसार इन्द्रायण की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसके फलमज्जा में कोलोसिन्थिन नामक तिक्त पदार्थ और एक प्रकार का राल होने के कारण ही आतों में रेचन की क्रिया होती है और मलावरोध दूर होता है। इनके अलावा हेण्ट्रिएकोटेन, ए-इलेटरिन, फाइटोस्टेराल और वसा अम्ल होते हैं। बीजों में तिक्त स्थिर तेल इपुरैनाल (Ipuranol) 21 प्रतिशत, फाइटोस्टेराल,ग्लाइकोसाइनाइड, हाइड्रोकार्बन, टैनिन और सैपोनिन होते हैं। प्रत्येक फल में छिलका 23 प्रतिशत, बीज 62 प्रतिशत और मज्जा 15 प्रतिशत होते हैं।

इन्द्रायण के हानिकारक प्रभाव Side Effects of Indrayan

मरोड़ अधिक उत्पन्न करने के कारण इन्द्रायण का अकेले व्यवहार नहीं किया जाता। अधिक मात्रा में इसे सेवन करने से विष के लक्षण उत्पन्न होते हैं। अत: प्रयोग सावधानी पूर्वक करना चाहिए।

इन्द्रायण के सेवन की मात्रा

फलों का चूर्ण 125 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम तक। जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम।

इन्द्रायण की उपलब्ध आयुर्वेदिक योग

इन्द्रायण वटी, इन्द्रायण तेल, इन्द्रायण अक।

इन्द्रायण का रोगों के इलाज में प्रयोग Indrayan Ke Fayde In Hindi

1. स्तन के रोग और इलाज : इन्द्रायण की जड़ को पानी में घिसकर बने लेप को स्तन पर लेप करने से उसकी सूजन, पीड़ा व घाव शीघ्र ठीक हो जाते हैं।

2. कान के रोगों का इलाज : इन्द्रायण के कच्चे या पके फल को कूटकर मसल लें और फिर 4 चम्मच तिल के तेल में मंद आंच पर पका लें। आधा तेल बचा रहने पर उसे छानकर शीशी में सुरक्षित रख लें। रोजाना सोने से पूर्व 2-3 बूंद डालने से बहरापन, कान में झनझनाहट, विभिन्न प्रकार की ध्वनियां सुनाई देना इत्यादि विकार ठीक हो जाते हैं।

3. शीघ्र प्रसव हेतु : इन्द्रायण की जड़ को प्रसूता के बालों में बांधने से शीघ्र प्रसव होता है। दूसरा प्रयोग इसकी जड़ के रस को रूई में भिगोकर योनि में रखने से भी यही लाभ मिलता है।

4. गर्भ धारण के लिए : बेल का फल इन्द्रायण की जड़ को बराबर की मात्रा में पीसकर पीने से स्त्री गर्भ धारण करने के योग्य बनती है | यह विशेषरूप से तब उपयोगी है जिस स्त्री को बच्चा न ठहर रहा हो |

5. ग्रन्थि शोथ : इन्द्रायण के पत्तो का लेप गाँठ पर बाँधने से वह बैठ जाती है|

6. प्रसूता का पेट बढ़ना : अनेक बार प्रसव होने से स्त्री का उदर क्षेत्र बेडौल होकर काफी बढ़ जाती है, ऐसे में इन्द्रायण के फल को पीसकर लेप तैयार करें और नियमित रूप से कुछ हफ्ते सोते समय पेट पर लगायें, पेट मूल अवस्था में आ जाएगा |

7. बवासीर के मस्सों पर : इन्द्रायण के बीजों को पानी में पीसकर लेप बनाए और उसे बवासीर के मस्सों पर दिन में 2 बार कुछ  हफ्ते तक लगाने से बवासीर में फायदा मिलता है |

8. गंजापन :  इन्द्रायण की जड़ को गोमूत्र में पीसकर नियमित रूप से गंजा वाले स्थानों पर लगाए | कुछ ही दिनों के प्रयोग से लाभ नजर आएगा |

9. कब्ज के इलाज में : इन्द्रायण के फल को घिसकर नाभि पर लगाए और इसकी जड़ का चूर्ण 2 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सोते समय लें| इससे पुराने से पुराना कब्ज भी ठीक हो जाता है |

जानें कब्ज होने पर घरेलू उपचार (इलाज)

10. उदर कृमि के इलाज में : 10 ग्राम गुड में 2 ग्राम  इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण मिलाकर सोते समय सेवन करने से 3-4 दिनों
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सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण

सिद्ध आयुर्वेदिक
              ★ सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण★

         *पाचन तंत्र की मजबूती के लिएे*
पेनक्रियाज (अग्नाशय) पाचन तंत्र की सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथि है, जो पेट के पीछे और छोटी आंत के पास में पाई जाती है।
 
पेनक्रियाज कमजोर होने पर सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण कारगर साबित होता है।
           *भूख न लगे तो यह चुर्ण रामबाण है*
             * पित्त वायु के लिए रामबाण*
             *अपेंडिक्स में रामबाण है*
*छाती और गले के छाल,मुंह छालेऔर जलन में फायदेमंद*
               *सिद्ध संतों की एक खोज*
*एक बार उपयोग करेगे तो बार बार मंगवागे*
             *सिद्ध पचन कल्पचुर्ण*
      *इंद्रायाण(कोड़तुम्बा) अजवाइन और*
         *गिलोय रस में तैयार होता है*
         *सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण चुर्ण*
        *पेट दर्द में कारगर है कल्पचुर्ण*
         *अपेंडिक्स में रामबाण है*
मानसिक तनाव, चिंता, भय, अवसाद, असंतुलित खान पान आदि आपके पाचन को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं|
गिलोय में digestive और stress दूर करने वाले गुण होते हैं जो की बदहजमी, कब्ज, गैस, मरोड़ आदि समस्याओं को दूर करता है और आपके पाचन को बेहतर बनाता है
      *यह गैस और कब्ज के लिये सर्वश्रेष्ठ दवा है।*
         *यह पेट के समस्त रोगों में लाभदायक है।*
   *सिद्ध  पाचन चूर्ण एक बेहतरीन दस्तावर औषधि है* |
    सभी रोग पेट के साफ न होने के कारण ही होते है
पेट साफ नही होगा बीमारी शरीर को जकड़ लेती हैं।
आयुर्वेद में कहा भी गया है कि स्वस्थ रहने का रास्ता पेट से होकर जाता है |
सिद्ध पाचक चूर्ण गैस्ट्रिक एवं कब्ज की समस्या में रामबाण औषधी साबित होती है |
आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में गैस्ट्रिक और कब्ज एक आम समस्या हो गई है जो हर घर में देखने को मिलती है |
सिद्ध पाचन चुर्ण आप को औऱ आपके  परिवार को रोग से मुक्ति दिलवा सकता है।
रोज या दूसरे दिन रात आधा चम्मच जरूर ले। आप कभी बीमार नही होंगे।
गैस बन गई हैं तो एक चुटकी मात्र चूसे 1 मिनट में जलन गैस समाप्त हो जाती है।
       सिद्ध पाचन चूर्ण बनाने की विधि
     सिद्ध  पाचन चूर्ण बनाने के लिए हमें –
त्रिफला                ~2 kg
बेल चुर्ण               ~ 1kg
ब्रह्मी बूटी              ~ 500 ग्राम
संखपुष्पी               ~200 ग्राम
हिंग                      ~  100 ग्राम
कालीमिर्च             ~  200 ग्राम
अजवायन             ~  400 ग्राम
दालचीनी             ~ 200 ग्राम
छोटी हरेड             ~  200 ग्राम
शुद्ध सज्जीखार     ~  100 ग्राम
सैंधा नमक            ~   50 ग्राम
नसादर                      100 ग्राम
काला नमक।                50 ग्राम
सौंफ भुनी             ~  100 ग्राम
पिपली छोटी              100 ग्राम
सोंठ                         100 ग्राम
पुदीना सत             ~    10ग्राम
निम्बू सत               ~   10 ग्राम 
मीठा सोडा             ~300 ग्राम
1लीटर गिलोय रस में भावना जरूर दे।
तभी यह पेट की हर इंफेसन को दूर करेगी।
अगर निम्बू औऱ पुदीना सत न मिले तो 20 ग्राम निम्बू रस में सभी चुर्ण को मिलाकर सायं में सुखाए।
इनको अच्छी तरह कूट – पीसकर और कपडछान कर के साफ़ एवं (Air Tight ) मजबूत डक्कन वाली शीशी में भर लेवे ,
  ★ यह गैस्ट्रिक और कब्ज की रामबाण औषधि है ★
मात्रा और सेवन विधि
पानी के साथ सेवन करे
सिद्ध पाचन चूर्ण को आधा चम्मच की मात्रा में रोज सुबह शाम सेवन करे |
बच्चों को कब्ज की या पेट दर्द की शकायत में चमच्च का 1/4 भाग गर्म पानी से दे।
1 से 6 महीने के बच्चों को एक चुटकी चटाएं।
लाभ
यह चूर्ण वायु तथा वात के सभी प्रकार के रोगों को दूर करता है |
इसके सेवन से पेट की अग्नि ठीक होती है |
अपान वायु बहार निकल जाती है ,
कब्ज को भी जड़ से दूर करने में सक्षम है |
यह चूर्ण बच्चो में भी लाभ कारी है |
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परहेज और आहार
लेने योग्य आहार
आहार में रेशेदार फल और सब्जियाँ जैसे सेब, संतरे, ब्रोकोली, बेरियाँ, नाशपाती, मटर, अंजीर, गाजर और फलियाँ आदि शामिल करें।
साबुत अनाज जैसे भूरे चावल, ज्वार, बाजरा, मेवे, गिरियाँ, और मछली, दालें, मसूर दाल, चावल और सोया के उत्पादों का प्रयोग बढ़ाएँ।
पानी मिला फलों का रस, प्राकृतिक पदार्थों से उत्पन्न सब्जियाँ, और औषधीय चाय पियें।
बीज सहित अमरुद और बेल का फल आँतों को व्यवस्थित करता है, और आहार में रेशे की मात्रा बढ़ाता है, ताकि कब्ज से राहत मिल सके। फल जैसे कि केले, आलूबुखारे, अंगूर और पपीता भी इसमें सहायक होते हैं।
★★★
इनसे परहेज करे
अधिक शक्कर उत्सर्जित करने वाले आहार जैसे रिफाइंड अनाज, शक्कर की गोलियाँ, केक और बिस्कुट आदि से परहेज।
रेड मीट, डेरी आहार, और अंडे।
कॉफ़ी, चाय और शक्करयुक्त कार्बन वाले पेय।
Online मंगवा सकते हैं।
सिद्ध अयूर्वादिक
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         ◆ किसी भी शरीरक  स्मयसा के लिए◆
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मंदाग्नि के 103 रोग

              *मंदाग्नि के 103 रोग*
    मंदाग्नि से होते हैं 103 हानिकारक रोग


             *पेट के हाजमे की अग्नि जब मध्म
पड़ जाती है तो अनेकों रोगों का शरीर पर हमला होने लग जाता है।*


   *सिद्ध आयुर्वेदिक आप को कर रहा है जागृत*
           *मंदाग्नि को दरुस्त करता है*
              *सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण*

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        *सिद्ध पाचन कल्पचुर्ण की*
    *जानकारी नीचे लिंकः में दी गई है*


       *मंदाग्नि रोगों की संपूर्ण जानकारी*

आयुर्वेद में बताया गया है कि मंदाग्नि (मन्द अगनी) से 103 प्रकार के रोग होते है, जिसमे पहले स्थान पर एसिडिटी और एक सौ तीन स्थान पर कैंसर को रखा गया है।

ये सूची यहाँ देने का प्रयास कर रही हूँ।
1. हाइपर एसिडिटी
2. जल्दी-जल्दी भूख लगना
3. भोजन के 4 घंटे बाद या खाली पेट जलन
4. अत्यधिक प्यास
5. हर समय मुँह सुखना
6. मसूढ़ो में संवेदनशीलता
7. लार का खट्टा होना
8. दाँतो में ढीलापन
9. होठो के किनारे फटना
10. दाँतो में ठंडा गर्म लगना
11. दाँतो का फटना या टुकड़ो में निकलना
12. दाँतो की नसों में दर्द
13. गले या टॉन्सिल का बार बार संक्रमण
14. अम्ल का मुँह में आना
15. अल्सर
16. खट्टी डकार
17. उदर के ऊपरी भाग में दर्द
18. बहुत ज्यादा गर्मी लगना या जलन होना
19. थकान, हाथ पैरो में भारीपन, मानसिक शक्ति का ह्रास
20. शरीर छूने से बुखार की अनुभूति
21. प्रसन्नता व उत्साह की कमी
22. अवसादित होने की प्रवृति
23. बिना कारण घबराहट, व्याकुलता, तेज शोरगुल में चिड़चिड़ाहट
24. अत्यधिक रक्तहीन चेहरा
25. सिरदर्द
26. आसानी से बातो बातो में आँसू आजाना
27. आँखों में सूजन, लाली, दर्द, जलन, गड़न
28. पलको एवं कोर्निया में प्रदाह
29. बालो का घुँघराले होना
30. नाख़ून पतले होना, जल्दी टूट जाना
31. रूखी त्वचा
32. बाल घुँघराले, बेजान, झड़ते
33. शरीर पर पसीने से खुजली
34. पित्ती उछलना
35. पिण्डलियों में बायटे आना, ऐंठन
36. झाईयां
37. कान में दर्द
38. आवाज़ में बदलाव
39. बैचैनी
40. कब्ज
41. ऑस्टियो ऑर्थोरिटिस
42. यूरिक एसिड बढ़ना
43. CRP बढ़ना
44. मासपेशियो में ऐंठन
45. पैर के बाहरी भाग में दर्द
46. अमाशय या अन्न नली में दर्द या घाव
47. बवासीर
48. भगन्दर
49. फिशर
50. गैस्ट्रिक

(वायु बनकर शरीर में घूमने से)

51. पेट में जलन
52. गले में जलन
53. छाती में जलन जैसे heart attack हो
54. सिर दर्द या भारीपन
55. चक्कर
56. कान में घंटियाँ बजना
57. हाई बी पी
58. सिर में भ्रम की स्थिति, समझ न आना
59. बालो का झड़ना
60. बालो का सफ़ेद होना या पकना
61. पीठ दर्द
62. धड़कन बढ़ना
63. पायरिया
64. मुँह में दुर्गन्ध
65. भूख न लगना
66. प्यास न लगना
67. खट्टी / कच्ची डकार
68. मितली होना
69. मल में गंध
70. पेट में भारीपन
71. अफारा
72. शुगर
73. ढीले मसूड़े
74. मसूढ़ो के किनारे सफ़ेद या हरी परत
75. मल थोड़ा पतला, लेकिन मुश्किल से निकले
76. उल्टी होने, करने के बाद हल्का महसूस होना
77. अनिद्रा
78. कोलेस्ट्रॉल बढ़ना
79. बॉडी का फूल जाना मोटा हो जाना
80. पैरो में चलने पर दर्द
81. मसूढ़ो से खून आना

(कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से होने वाले रोग)

82. रक्त वाहिनियों में अवरोध
83. हृदयाघात
84. रक्त वाहिनियों का का संकरा होना
85. धमनियों में थक्के जमना
86. अत्यधिक बलगम
87. साँस लेने में कठिनाई
88. सीने में भारीपन
89. धमनियों में कड़कपन
90. किडनी से जुडी हुई बीमारियाँ
91. मस्तिष्क में ब्लड सप्लाई अवरोध होने से भूलने की समस्या
92. शरीर में जगह जगह गाँठे
93. हर्निया
94. गर्भाशय का स्थान से नीचे लटक जाना
95. हाथ पैर पतले होना
96. आंतरिक या बाहरी रक्त स्त्राव
97. आँखों का कमजोर होना
98. आँखों के सामने कुछ उड़ता प्रतीत होना
99. मुँह में कफ़ ज्यादा आना
100. पसीने में बदबू
101. मल मूत्र ज्यादा होना, मल लेसदार होना
102. हाथ पैरो में फड़कन
103. शरीर में होने वाला कैंसर

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